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Annotated captions of Bruce Schneier: The security mirage in Hindi

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तो सुरक्षा दो अलग बातें हैं :

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ये एक तरफ एहसास है और दूसरी तरफ सच्चाई

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और वो अलग अलग हैं

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आप सुरक्षित महसूस कर सकते हैं

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भले ही आप ना हो

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और आप सुरक्षित हो सकते हैं

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भले ही आप ऐसा महसूस ना करें

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सच में हमारे पास दो अलग धारणाये हैं

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जो कि एक ही शब्द से जुड़े हैं

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और मैं इस व्याख्यान में इन्हें

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अलग अलग करना चाहता हूँ

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ये पता लगाऊं कि वो कब अलग अलग होते हैं

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और कैसे मिल जाते हैं

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और भाषा यहाँ पे एक समस्या है|

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बहुत सारे शब्द उपलब्ध नहीं हैं उन धारणाओ

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के लिए जिनके बारे में हम बातें करने वाले है|

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तो अगर आप सुरक्षा के बारे में सोचें

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आर्थिक रूप में

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यह चीज़ो को चुनने की दुविधा हैं

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हर बार जब आपको सुरक्षा मिलेगी,

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उसके बदले में आप कुछ और दे रहे होंगे

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चाहे ये आपका व्यक्तिगत निर्णय हो

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चाहे आप अपने घर में चोरी से बचने वाला अलार्म लगवाने वाले हो,

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या फिर राष्ट्रीय फैसला जहाँ आप दुसरे देश पे आक्रमण करने वाले हो,

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उसके बदले में आप कुछ न कुछ दे रहे होंगे |

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चाहे पैसा हो, समय हो, सहूलियत हो या योग्यता हो

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या शायद आधारभूत स्वतंत्रता

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और जो सवाल हमे पूछना चाहिए जब हम सुरक्षा के बारे में सोचते हैं,

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ये नहीं कि ये हमे सुरक्षित बनाएगा,

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पर ये कि क्या ये इस लायक हैं कि हम इसके बदले किसी दूसरी चीज़ को दे दे |

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आपने सुना होगा पिछले कई सालो में,

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दुनिया सुरक्षित हो गई है क्यूंकि सद्दाम हुस्सेन सत्ता में नहीं हैं

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ये सच हो सकता है लेकिन पूरी तरह से तर्क संगत नहीं है|

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सवाल यह कि क्या यह इस योग्य था?

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और आप खुद के निर्णय ले सकते हैं,

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और उसके बाद फैसला कर सकते हैं कि क्या ये आक्रमण सही था

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आप सुरक्षा के बारे में ऐसे सोचते हैं

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व्यापारिक लेन देन के रूप में

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अब यहाँ सामान्यत: कोई सही या गलत नहीं होता

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हमसे कुछ लोगों के यहाँ चोर अलार्म होता हैं

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कुछ के यहाँ पर नहीं|

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और ये निर्भर करता है हम कहाँ रहते हैं,

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क्या हम अकेले रहते हैं या फिर परिवार के साथ,

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हमारे पास कितने अच्छे अच्छे सामान हैं,

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हम किस हद तक तैयार हैं

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चोरी का खतरा उठाने को

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राजनीति में भी

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अलग अलग विचार हैं,

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ज्यादातर समय विनिमय की ये दुविधा

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सुरक्षा के अलावा दुसरे कारणों से होते हैं,

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और मैं ये सोचता हूँ कि ये बहुत जरुरी हैं|

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अब लोगों के पास पाकृतिक ज्ञान हैं

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इस विनिमय का,

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हम ये हर दिन करते हैं जैसे कि,

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कल रात जब मैंने अपने होटल रूम

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के दरवाजे को दुबारा बंद किया,

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या आपने अपनी कार में किया जब आप यहाँ पर पहुंचे,

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या जब हम खाना खाने जाते हैं

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और सोचते हैं की खाना अच्छा है तो हम खा लेंगे |

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हम ये विनिमय बार बार करते हैं

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दिन में कई बार|

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हम कई बार इन पर ध्यान भी नहीं देते हैं|

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ये तो बस एक हिस्सा है जीवित होने का, हम सब करते हैं|

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हर प्रजाति करती हैं|

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कल्पना कीजिये एक खरगोश मैदान में घास खा रहा हैं,

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अब अगर खरगोश लोमड़ी को देखता है|

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तो वो तुरंत एक सुरक्षा विनिमय करेगा,

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"मैं यहाँ रुकूं?" या "मै यहाँ से भाग जाऊ?"

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और अगर आप इस बारें में सोचे

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तो वो खरगोश जो अच्छे होते हैं इस तरह के विनिमय में वो

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ज्यादा समय तक जिन्दा रहते हैं और प्रजनन करते हैं|

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और वो खरगोश जो अच्छे नहीं होते हैं वो

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या तो शिकार बन जाते हैं या भूख से मर जाते हैं|

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तो अब आप सोचेंगे,

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कि हम, सफल प्रजाति होने के नाते,

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आप, मैं, हम सब

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इस तरह के विनिमय में बहुत अच्छे हैं |

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ऐसा होने पर भी बार बार प्रतीत होता है,

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कि हम लोग निराशापूर्ण रूप से अच्छे नहीं हैं|

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और मैं ये सोचता हूँ कि ये एक आधारभूत रोचक सवाल है|

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मैं आपको बहुत ही छोटा सा जवाब दूंगा|

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जवाब यह है कि हम लोग प्रतिक्रिया करते है सुरक्षा की भावना पर

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ना कि सुरक्षा की सच्चाई पर |

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हाँ ज्यादातर समय ये काम करती हैं |

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क्यूंकि ज्यादातर समय

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सुरक्षा की भावना और सुरक्षा की सच्चाई एक सी ही होती हैं |

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निश्चित तौर पे ये सच हैं

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ज्यादातर प्रागतिहासिक मानव के लिए |

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हमने ये योग्यता विकसित की हैं

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क्यूंकि ये हमारे विकसित होने से जुड़ी हुई है |

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एक तरीका ऐसे सोचने का हैं

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कि हम लोग बहुत ही ज्यादा परिष्कृत हैं

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ऐसे खतरों से भरे निर्णय लेने में

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जो छोटे परिवारों में रहने वालो के लिए रोजमर्रा की बात होती थी

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१०००० इ पूर्व, पूर्वी अफ्रीकन मैदोनो में --

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२०१० में न्यू योर्क इस तरह का नहीं हैं |

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अब खतरे को समझना बहुत तरह से पक्षपात पूर्ण है |

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बहुत सारे अच्छे प्रयोग हुए हैं|

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और आप देख सकते हैं इस पक्षपात ( झुकाव ) को बार बार आते हुए |

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तो मैं आपको चार प्रयोग बताऊंगा |

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हमारा झुकाव होता हैं असाधारण और विरले खतरों को बढ़ा चढ़ा कर बताने की ओर

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और सामान्य खतरों की अहमियत कम करने की ओर,

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जैसे हवाई जहाज की अपेक्षा कार का सफ़र |

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अनजाने खतरों को हम परिचित खतरों से

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ज्यादा खतरनाक समझते हैं

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एक उदाहरण हो सकता है

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कि लोग अनजान लोगो के द्वारा अपहरण से डरते हैं,

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जबकि आंकड़े बतलाते हैं कि रिश्तेदारों के द्वारा अपहरण होना ज्यादा सामान्य है |

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यह आंकड़े बच्चो के लिए हैं|

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तीसरा, खतरे जिन्हें चेहरे दिए गए हो

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गुमनाम खतरे की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक लगते हैं

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तो बिन लादेन डरावना है क्यूंकि उसका नाम है|

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और चौथा,

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लोग खतरों को कम कर के आंकते हैं

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उन परिस्थितिओ में जिनको वो नियंत्रित कर सकते हैं

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और बढ़ा चढ़ा कर आंकते है उन परिस्थितिओ में जिनको वो नियंत्रित नहीं कर सकते हैं |

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तो जब आप स्काय डाइविंग या धुम्रपान के लिए जाते हैं

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आप खतरों को कम कर के आंकते हैं |

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अगर आप पर कोई खतरा थोपा जाता हैं जैसे कि आतंकवाद एक अच्छा उदहारण हैं

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तो आप बढ़ा चढ़ा कर प्रतिक्रिया देते हैं, क्युकि आपको ये आपके नियंत्रण में नहीं लगता हैं |

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ऐसे ही बहुत सारे पक्षपात करते हैं विशेषतः दिमागी पक्षपात

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जो हमारे खतरों से जुड़े निर्णयों पर प्रभाव डालते हैं |

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हमारे पास अपने अनुभव की उपलब्धता हैं

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जिसका असल में मतलब हैं कि,

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हम किसी चीज़ के होने की प्रायिकता का अनुमान

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इस बात से लगाते हैं कि उससे जुड़ी घटनाओ को कितनी सरलता से हम सोच सकते हैं

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तो आप ये कल्पना कर सकते हैं कि ये कैसे काम करती हैं,

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जैसे कि अगर आपने बाघों के आक्रमण के बारे में बहुत सुना हैं तो बहुत सारे बाघ आस पास ही होंगे

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अगर आपने शेरो के आक्रमण के बारे में नहीं सुना है तो बहुत सारे शेर आस पास नही होंगे |

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यह काम करता हैं जब तक समाचार पत्र इजाद नहीं हुए थे |

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क्यूंकि समाचार् पत्र जो करते हैं वो ये

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कि वो बार बार दुहराते हैं

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विरले खतरों को|

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मैं लोगो से कहता हूँ कि अगर ये समाचार हैं तो इससे डरने की जरुरत नहीं

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क्यूंकि परिभाषा से

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समाचार वो हैं जो ज्यादातर कभी भी घटित नहीं होता|

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( हंसी )

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जब चीज़े इतनी सामान्य हो जाये तो वो समाचार नहीं रह जाती,

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कार का टकराना, घरेलु हिंसा

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ये सारे खतरें हैं जिनकी आपको चिंता करनी चाहिए |

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हम भी कहानी बताने वालों की प्रजाति हैं,

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हम आंकड़ो की अपेक्षा कहनियों पर ज्यादा प्रतिक्रिया देते हैं

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और कुछ मूलभूत अज्ञानता अभी भी चल रही हैं |

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मेरा मतलब हैं कि चुटकुला "एक, दो, तीन और कई" कुछ हद तक सही हैं

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हम छोटे संख्याओ पर बहुत अच्छे हैं,

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एक आम, दो आम, तीन आम,

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१०००० आम, १००००० आम,

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अभी भी बहुत से आम हैं जिन्हें ख़राब होने के पहले खाया जा सकता है

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तो १/२ , १/४, १/५ हम इनमे अच्छे हैं |

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लाखो में एक, करोड़ो में एक

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ये दोनों लगभग कभी नहीं होते |

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तो हमे उन खतरों से परेशानी होती हैं

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जो इतने सामान्य नहीं हैं |

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और ये दिमागी पक्षपात हमारे और सच्चाई के

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बीच में छलनी की तरह कार्य करता हैं |

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और परिणाम ये कि

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जब अचानक अहसास और सच्चाई बाहर आते हैं

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तो वो अलग अलग होते हैं|

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तो अब पहले से ज्यादा सुरक्षित होने का अहसास हो सकता हैं

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सुरक्षित होने का एक झूठा भाव

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या फिर दूसरी तरफ

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असुरक्षित होने का एक झूठा भाव

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मैंने "सुरक्षित थेअटर" के बारे में बहुत लिखा है

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जो ऐसे उत्पाद हैं जो लोगों को महसूस कराते हैं कि वो सुरक्षित हैं,

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जबकि वास्तविकता में वो कुछ नहीं करते |

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ऐसी चीज़ के लिए कोई भी शब्द नहीं हैं जो हमे सुरक्षित तो करे

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लेकिन सुरक्षित होने का अहसास ना कराये |

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शायद हमारे लिए सी. आई. ऐ. का यही काम हैं

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तो वापस चलते हैं अर्थशास्त्र की तरफ

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यदि अर्थशास्त्र, यदि बाज़ार, चलाते हैं सुरक्षा को

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और यदि लोग विनिमय करते हैं

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अपने सुरक्षित होने के अहसास के आधार पर,

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तब जो समझदारी भरा काम जो कंपनियां कर सकती हैं,

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आर्थिक फायदों के लिए

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वो ये कि वो लोगों को सुरक्षित महसूस कराये |

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और ये करने के दो तरीके हैं

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पहला कि आप लोगों को असलियत में सुरक्षित रखे

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और उम्मीद रखे कि उन्हें पता चले |

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या दूसरा कि आप लोगों को बस सुरक्षित महसूस कराये

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और ये उम्मीद रखे कि उन्हें पता नहीं चले |

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तो ऐसा क्या हैं जिससे लोग को पता चलता हैं?

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कई चीज़ों से :

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सुरक्षा की समझ,

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खतरों की समझ, आतंक की समझ,

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और उपायों की, वो कैसे काम करते हैं|

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लेकिन अगर आप चीज़ों को समझते हैं

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तब ज्यादा सम्भावना हैं कि आपके अहसास सच्चाई के जैसे ही होंगे |

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पर्याप्त वास्तविक उदहारण मदद करेंगे|

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अभी हम सब अपने आस पड़ोस में जुर्म की दर जानते हैं,

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क्यूंकि हम वहां रहते हैं और हमे वहां का अहसास है

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जो सच्चाई के साथ बिलकुल सही बैठता है |

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तो सुरक्षा के थेअटर का तब पर्दाफाश हो जाता हैं

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जब ये साफ़ हो जाये कि ये ठीक से काम नहीं कर रहा |

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अच्छा तो ऐसा क्या हैं जिससे लोगों को पता नहीं चलता,

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तंत्र की कम समझ

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यदि आप खतरों को नहीं समझेंगे तो आप कीमत नहीं समझेंगे

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और संभवत: गलत विनिमय करेंगे |

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और आपका अहसास सच्चाई के जैसा नहीं होगा |

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ज्यादा पर्याप्त उदहारण नहीं हैं |

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ये कम प्रायिकता वाली घटनायो के साथ

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एक अंदरूनी समस्या हैं |

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उदहारण के लिए,

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आतंकवाद लग भग नहीं के बराबर ही घटित होता है,

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तो आतंकवाद विरोधी उपायों

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के प्रभाविकता का आंकलन करना बहुत ही कठिन है |

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इसीलिए तो आप virgins का बलिदान देते आ रहे हैं

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और इसीलिए तो आपका unicorn पे आधारित बचाव बहुत अच्छा काम कर रहा है |

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यहाँ असफलता के बहुत पर्याप्त उदहारण नहीं हैं|

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साथ ही साथ भावनाए जो धुंधला कर रही हैं, जैसे की ,

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दिमागी पक्षपात, जिसके बारे में मैंने पहले बात की,

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डर, स्थानीय विश्वास,

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वो असल में सच्चाई का एक अपर्याप्त नमूना है |

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तो मुझे चीज़ों को जटिल बनाने दे |

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मेरे पास अहसास और सच्चाई हैं |

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अब मैं एक तीसरा अवयव जोड़ना चाहता हूँ | मैं "नमूना" जोड़ना चाहूँगा |

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अहसास और नमूना हमारे दिमाग में और

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सच्चाई बाहर दुनिया में |

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ये नहीं बदलती हैं, ये सच हैं |

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तो अहसास हमारे सहज ज्ञान पर आधारित हैं|

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नमूना तर्क पर आधारित हैं |

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इन दोनों के बीच में यही मूल भिन्नता हैं |

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आदिम और सरल दुनिया में

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नमूने के लिए वास्तविकता में कोई तर्क नहीं है |

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क्यूंकि अहसास सच्चाई के बहुत करीब है |

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तो आपको नमूने की जरुरत नहीं है |

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लेकिन एक नए और जटिल दुनिया में

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आपको नमूनों की जरुरत हैं -

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उन खतरों को समझने के लिए जिनका हम सामना करते हैं |

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जीवाणुओं के लिए हममे कोई अहसास नहीं होता |

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आपको एक नमूने की जरुरत होगी उन्हें समझने के लिए |

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तो ये नमूना

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सच्चाई का एक समझदारी भरा प्रस्तुतीकरण है |

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ये, बिलकुल बंधा हुआ है विज्ञान से,

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तकनीक से |

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जीवाणुओं को देखने के लिए, माइक्रोस्कोप का इजाद होने से पहले

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हमारे पास बीमारियों के लिए जीवाणु का सिद्धांत नहीं हो सकता था

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ये बंधा हुआ है हमारे दिमागी पक्षपात से |

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लेकिन इसके पास योग्यता है कि

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ये हमारे अहसासों को रद्द कर सकता है |

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तो ये नमूने हमको कहाँ से मिलेंगे? हमको ये दूसरो से मिलते हैं |

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हमे धर्मं, संस्कृति, शिक्षक और बड़े बुजुर्गो

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से ये नमूने मिलते हैं |

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कुछ साल पहले

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मैं द. अफ्रीका में जंगल की सैर पर था,

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मैं जिस शिकारी के साथ था वो क्रूगर राष्ट्रीय पार्क में बड़ा हुआ था,

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उसके पास जंगल में जीवन को बचाने के बहुत ही जटिल नमूने थे

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और ये निर्भर करते हैं कि अगर आप पर हमला

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किसी शेर ने या तेंदुआ ने या गेंडे ने या एक हाथी ने किया हैं --

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और कब आपको भागना होगा और कब आपको किसी पेड़ पे चढ़ना होगा |

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जब आप पेड़ पर कभी चढ़ ही नहीं सकते

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तो मैं वहां एक दिन में मर गया होता,

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लेकिन वो वहां पैदा हुआ था

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और वो समझता था कि कैसे जीवित रहा जाए

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मै न्यू योर्क शहर में पैदा हुआ था,

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अगर मै उसे अपने साथ यहाँ ले आया होता और वो यहाँ एक दिन में मर गया होता |

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(हंसी)

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क्यूंकि हमारे नमूने अलग अलग हैं,

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जो हमारे अलग अलग अनुभवों पर आधारित है |

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नमूने संचार के माध्यम से आ सकते हैं

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हमारे चुने हुए अधिकारीयों से |

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सोचें जरा आतंकवाद के नमूने को,

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बच्चो के अपहरण के नमूने को,

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हवाई जहाज सुरक्षा, कार सुरक्षा,

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नमूने आ सकते हैं उद्योग से |

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जो दो मै सोच रहा हूँ वो हैं निगरानी कैमरा

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और आई. डी. कार्ड्स ,

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बहुत सारे कंप्यूटर सुरक्षा के नमूने यही से आये हुए हैं |

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कई नमूने विज्ञान से आये हुए हैं |

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स्वास्थ्य के नमूने अच्छे उदाहरण हैं |

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कैंसर, बर्ड फ्लू, स्वीन फ्लू, स.अ.र.स. के बारे में सोचिए |

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इन बीमारियों के बारे में हमारे

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सुरक्षा के सारे अहसास

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उन नमूनों से आते हैं,

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जो हमे दिए जाते हैं, असल में संचार माध्यम के द्वारा छान हुए विज्ञान से |

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तो नमूने बदल सकते हैं |

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नमूने स्थायी नहीं है

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जैसे जैसे हम अपने वातावरण में ज्यादा आरामदायक महसूस करते हैं,

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हमारा नमूना हमारे अहसासों के और करीब होता जाता है |

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तो एक उदहारण हो सकता है,

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अगर आप १०० साल पीछे जाएँ

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जब पहली बार बिजली सामान्य हो रही थी,

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तब इसके बारे में कई डर थे |

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मेरा मतलब, कई लोग डरते थे दरवाजे की घंटी बजाने से

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क्यूंकि उसमे बिजली थी और उनके लिए वो खतरनाक थी

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हमारे लिए बिजली से जुड़ी चीजे बहुत आसान हैं

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हम बिजली के बल्ब बदलते हैं

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बिजली के बारे में बिना सोचे हुए |

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बिजली के लिए हमारा सुरक्षा नमूना

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कुछ ऐसा है जिसमे हम पैदा हुए हैं |

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हमारे बड़े होने के साथ यह बदला नहीं है

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और हम इसमें अच्छे हैं|

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या सोचिये इन्टरनेट के

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विभिन्न पीढियों के लिए खतरे के बारे में --

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आपके परेंट्स इन्टरनेट सुरक्षा के बारे में कैसे सोचते हैं,

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और आप कैसे सोचते हैं

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और आपके बच्चे कैसे सोचेंगे |

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पृष्टभूमि में नमूने आख़िरकार गायब हो जायंगे

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सहज ज्ञान का दूसरा नाम परिचित होना है|

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तो अगर नमूना सच्चाई के करीब है

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और ये हमारे अहसासों से मिल जायेंगे,

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और जयादातर समय आपको पता भी नहीं चलेगा |

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तो एक अच्छा उदहारण इसका आता है

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पिछले साल स्वीन फ्लू से |

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जब स्वेन फ्लू पहली बार आया

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तब पहले पहले समाचार ने जरुरत से ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा की |

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अब इसका नाम है

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जिसने इसको और डरावना बना दिया

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सामान्य फ्लू से भले ही ये ज्यादा घातक था |

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और लोगों ने सोचा डाक्टर्स इस लायक है कि वो इसका उपाय ढूंढ़ लेंगे|

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तो यहाँ पे एक अहसास था की स्थिति नियंत्रण से बाहर है |

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और इन दोनों चीज़ों

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ने खतरों को वास्तविकता से बड़ा बना दिया |

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जैसे जैसे अनूठापन गया, महीने बीतें,

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सहन करने की क्षमता बढ़ी,

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और लोगों को इसकी आदत हो गयी

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अब कोई नए आंकड़े नहीं थे, लेकिन फिर भी डर कम था |

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शरद ऋतू के आते

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तक लोंगो ने सोचा कि

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डाक्टर्स ने इसे सुलझा लिया होगा |

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और यहाँ एक प्रकार का द्वि विभाजन है,

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लोगों को चुनना था

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डर और सच को स्वीकार करने में

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असल में डर और उदासीनता के बीच में,

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उन्होंने एक प्रकार से संदेह चुना |

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और जब पिछले ठण्ड में टीका आया,

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बहुत से लोग ऐसे थे - बहुत ज्यादा -

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जिन्होंने टीका लेने से मना कर दिया --

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एक अच्छा उदहारण

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लोगों के अहसास कैसे बदलते हैं, नमूने कैसे बदलते हैं,

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अजीबोगरीब रूप से,

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कोई नयी सूचना ना होने के बाद भी,

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कोई नयी सूचना नहीं,

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ये अक्सर होता है |

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मैं एक नयी जटिलता देने वाला हूँ,

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हमारे पास अहसास है, नमूने हैं, सच्चाई हैं |

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मेरे पास सुरक्षा का परस्पर दृश्य है |

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मैं सोचता हूँ ये देखने वाले पर निर्भर करता है |

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और जयादा सुरक्षा निर्णयों में

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बहुत से लोग शामिल रहते हैं |

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और भागीदार

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जिनकी अपनी विनिमय शर्ते हैं

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निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश करते है |

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और मैं इसके उनका अजेंडा कहता हूँ |

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और आप देख सकते हैं कि उनका अजेंडा ,

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ये दुकानदारी, ये राजनीति

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कोशिश करती रहती है कि आप एक नमूने के ऊपर दुसरे को चुने |

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कोशिश करते है कि आप एक नमूने को नजर अंदाज करें

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और अपनी भावनाओं का भरोसा करें,

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उन लोगों प्रभावहीन करना जो उस नमूने का समर्थन करते हैं जिनको आप नहीं पसंद करते |

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ये बहुत अनोखा नहीं है |

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एक उदाहरण, एक बहुत बढ़िया उदाहरण है, धुम्रपान का खतरा |

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पिछले ५० सालों के इतिहास में, धुम्रपान का खतरा

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बतलाता है एक नमूना कैसे बदलता है ,

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और ये भी कि एक उद्योग कैसे लड़ता है

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एक नमूने से जिसको वो पसंद नहीं करता |

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उसी पुरानी धूम्रपान की बहस की तुलना में --

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शायद लगभग २० साल पहले |

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सीट बेल्ट के बारे में सोचें |

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जब मैं बच्चा था तब कोई भी सीट बेल्ट नहीं पहनता था |

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आज कल कोई बच्चा आपको गाडी चलाने नहीं देगा

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अगर आपने सीट बेल्ट ना लगायी हो तो |

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एयर बैग की बहस की तुलना में --

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शायद लग भग ३० साल पहले |

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सारे उदाहरण नमूनों के बदल रहे है |

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हमने ये सीखा कि नमूनों को बदलना कठिन है |

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नमूनों को शक्ति से हटाना कठिन है |

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अगर वो आपकी भावनाओं के करीब है तो

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आपको पता भी नहीं चलेगा की आपके पास एक नमूना है|

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और यहाँ पे एक और दिमागी पक्षपात है,

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जिसे मैं कहूँगा " सुनिश्चित पक्षपात "

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जहाँ हम उन आंकड़ो को स्वीकार करते हैं

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जो हमारे विशवास से मिलते हैं

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और उन आंकड़ों को अस्वीकार कर देते हैं

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जो हमारे विश्वासों के खिलाफ होते हैं |

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संभवत: हम इन्हें नज़र अंदाज़ कर देंगे भले ही वो बहुत सही हो

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इसको बहुत ही जयादा अकाट्य होना पड़ेगा इसके पहले की हम ध्यान देना शुरू करें |

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नए नमूने जो इतने लम्बे समय तक चलते हैं वो कठिन होते हैं |

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ग्लोबल वार्मिंग एक अच्छा उदाहरण है |

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हम लोग बहुत ही भयानक है

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ऐसे नमूने में जो ८० साल का है |

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हम लोग अगली फसल तक ये कर सकते है |

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हम तब तक ये कर सकते है जब तक हमारे बच्चे बड़े नहीं होते |

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लेकिन फिर भी ८० सालों के बाद भी हम लोग इसमें अच्छे नहीं है |

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तो स्वीकार करने के लिए ये एक बहुत ही कठिन नमूना है |

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हम दोनों नमूनों को अपने दिमाग में एक साथ रख सकते हैं,

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या उस समस्या को

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जहाँ हम अपने विश्वास या दिमागी असंगति को

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एक साथ रख रहे हैं,

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आखिरकार,

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नया नमूना पुराने की जगह ले लेगा |

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मजबूत अहसास एक नमूना बना सकते है |

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सितम्बर ११ ने एक सुरक्षा नमूना बनाया

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बहुत सारे लोगों के दिमाग में |

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जुर्म के साथ खुद के अनुभव भी ये काम कर सकते हैं |

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खुद के स्वास्थ्य का डर ,

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समाचारों में स्वास्थ्य का डर |

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आप देखेंगे की ये "फ्लेश बल्ब " घटनाये कहलाती हैं

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मनोचिक्त्सिक की भाषा में |

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वे तुरंत नमूने बना सकते है

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क्यूंकि वे बहुत ही भावोत्तेजक होते है

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तो इन तकनिकी दुनिया में

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हमारे पास अनुभव नहीं होते

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ताकि हम नमूनों का आंकलन कर सके |

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और हम दूसरों पे निर्भर रहते हैं | हम प्रतिनिधि पे भरोसा करते हैं |

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मेरा मतलब ये तब तक काम करता है जब तक ये दूसरो को ठीक करे |

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हम शासकीय संस्थाओ पे भरोसा करते हैं

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ये बताने के लिए कि pharmaceuticals सुरक्षित है |

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मैं कल ही यहाँ हवाई जहाज से आया,

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मैंने हवाई अड्डे पे जांच नहीं की,

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मैंने दुसरे समूह पे भरोसा किया,

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ये पता लगाने के लिए की क्या मेरा जहाज उड़ने के लिए सुरक्षित है |

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हम लोग यहाँ है, हम में से किसी को भी डर नहीं है कि ये छत हमपे गिर सकती है |

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इसलिए नहीं की हमने जांच की है

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लेकिन हम लोग बिलकुल ये जानते है

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की इमारतों के मानक यहाँ अच्छे है

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ये एक नमूना है जो हम स्वीकार करते हैं

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बहुत कुछ बस अपने विश्वास से |

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और ये सही है |

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अब हम जो चाहते है

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वो ये की लोग परिचित हो जाए

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अच्छे नमूनों से

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और ऐसे की वो प्रतिबिम्बित हो उनके अहसासों में

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ताकि वो सुरक्षा के विनिमय कर सके |

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और जब ऐसा होता है

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तब आपके पास दो विकल्प होते हैं

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पहला, आप लोगों के अहसासों को ठीक करें ,

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सीधे उनके अहसासों पर काम करें |

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ये हेराफेरी है लेकिन ये काम करती है

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दूसरी, ज्यादा इमानदार तरीका,

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ये की आप अपना नमूना ठीक करें |

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बदलाव धीरे धीरे होता है |

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धुम्रपान की बहस ने ४० साल लिए

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और जबकि वो आसान थी |

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इसमें से कुछ चीज़ें कठिन हैं,

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मेरा मतलब सच में कठिन,

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ऐसा लगता है कि सूचना हमारी सबसे बढ़िया उम्मीद है |

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और मैंने झूठ बोला |

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याद है जब मैंने कहा भावनाएं, नमूने, सच्चाई |

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और मैंने कहा था सच्चाई नहीं बदलती है| असल में ये बदलती है |

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हम तकनिकी दुनिया में रहते हैं ;

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सच्चाई हर समय बदलती रहती है |

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तो हम शायद -- पहली बार इस प्रजाति में --

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भावनाए पीछा करती हैं नमूने का, नमूने पीछा करते हैं सच्चाई का, और सच्चाई भाग रही है --

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तो वो कभी ना मिल पायें |

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हम नहीं जानते |

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लेकिन लम्बे समय में

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दोनों अहसास और सच्चाई महत्वपूर्ण है |

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और मैं दो छोटी कहानियों के साथ इसे समाप्त करना चाहूँगा |

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१९८२ - मैं नहीं जनता लोगों को ये याद भी है या नहीं --

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एक tylenol विष की छोटी महामारी

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अमेरिका में फैली थी

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ये एक भयानक कहानी है| किसी ने एक बोतल ली tylenol

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की उसमे विष भर दिया, उसे बंद किया, और उसे दराज में वापस रख दिया |

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किसी और ने उसे खरीदा और मर गया |

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इसने लोगों को डरा दिया |

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उसके बाद कई नक़ल हमले हुए |

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उसमे कोई भी असली खतरा नहीं था लेकिन लोग डरे हुए थे

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और इस तरह

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छेड़ छाड़ सुरक्षित drug उद्योग इजाद हुई |

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छेड़ छाड़ सुरक्षित ढक्कन इसी से आये |

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ये एक सम्पूर्ण सुरक्षा थेअटर है |

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गृहकार्य के रूप में इसको हराने के १० तरीके सोचिये |

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मैंने आपको एक बताता हूँ, एक सुई

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लेकिन इसने लोगों को सुरक्षित महसूस कराया |

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इसने उनके सुरक्षित होने के अहसास को

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और करीब लाया सच्चाई के |

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आखिरी कहानी, कुछ साल पहले, मेरी एक दोस्त ने बच्चे को जन्म दिया |

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मैं उससे मिलने हॉस्पिटल गया,

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मुझे पता चला कि जब बच्ची का जन्म हो गया है तो,

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उन्होंने एक आर. अफ. आई. दी. कंगन पहना दिया बच्ची को,

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और एक वैसा ही बच्ची की माँ को

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ताकि उसको माँ को छोड़कर और कोई बच्ची को बाहर ले जाये तो

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एक अलार्म बज जायेगा |

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मैंने कहा अच्छा, ये बढ़िया है |

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मैं सोचा बच्ची को चुराना नियंत्रण से कितना बाहर है

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हास्पिटल के बाहर ?

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मैं घर गया और देखा इसके बारे में |

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ये असल में कभी हुआ ही नहीं |

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लेकिन अगर आप इसके बारे में सोचें ,

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आप हास्पिटल में हैं

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और आपको बच्ची को माँ से दूर ले जाना हैं

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दुसरे कमरे में ताकि आप कोई परिक्षण कर सके तो

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या तो आपके पास कोई अच्छा बेहतर सुरक्षा थेअटर होना चाहिए

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नहीं तो उसे आपका हाथ काटना पड़ेगा |

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(हंसी )

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तो ये हमारे लिए जरुरी हैं,

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उन लोगों के लिए जो सुरक्षा की रचना करते हैं,

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जो सुरक्षा के नियमो को देखते हैं ,

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या बल्कि जो जनता के नियमो को देखते हैं

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उन तरीको से जिससे ये सुरक्षा पर प्रभाव डालते हैं |

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ये केवल सच्चाई नहीं हैं ये अहसास और सच्चाई हैं |

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जो जरुरी हैं वो ये

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वे एक से रहे |

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ये जरुरी है अगर हमारे अहसास सच्चाई से मिले

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तो हम अच्छे सुरक्षा विनिमय कर सकते हैं |

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धन्यवाद

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(अभिवादन)